
80 के दशक के मध्य की बात है. स्वतंत्रता दिवस पर छुट्टी थी. मैं बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता था. लेकिन मेरी मां ने सख्ती से कहा, "आज बाहर मत जाओ… कौन जाने क्या हो जाए. बम और जाने क्या-क्या फट सकते हैं." यह चेतावनी आज भी हर स्वतंत्रता दिवस पर मेरे कानों में गूंजती है.
1970 और 1980 के दशक में मणिपुर घाटी में जन्मे ज्यादातर लोग इस बात को याद कर पाएंगे, वे उग्रवाद के चरम दिन थे. घाटी-केंद्रित नेतृत्व वाले उग्रवादी समूहों ने दैनिक अख़बारों के ज़रिए अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि विरोध के प्रतीक के रूप में स्वतंत्रता दिवस समारोहों का बहिष्कार किया जाएगा. उन्होंने जनता से किसी भी कार्यक्रम में भाग न लेने की अपील इस बात पर ज़ोर देते हुए की, कि मणिपुर को 1949 में जबरन भारतीय संघ में मिला लिया गया था. 1980 के दशक के दौरान शुरू हुआ बहिष्कार का आह्वान आज भी जारी है.