
कैसा अजीब मंजर है आंखों के सामने कि लोकतंत्र के पन्ने-पन्ने उखड़ कर, रद्दी कागजों-से हवा में इधर-उधर उड़ रहे हैं और इन्हीं पन्नों के बल पिछले एक दशक से ज्यादा समय से सत्ता में बैठी सरकार आंखें मूंदे बैठी है. कुछ वैसे ही जैसे बिल्ली सामने से भागते चूहों की तरफ से तब तक आंख मूंदे रहने का स्वांग करती रहती है जब तक कोई चूहा एकदम पकड़ की जद में न आ जाए. दूसरी तरफ़ नौकरशाही से छांट कर लाई गई वह तिकड़ी बैठी है जिसे हम अब तक चुनाव आयोग कहते आ रहे थे. वह हवा में उड़ते-फटते अपने ही मतदाता सूची के पन्नों को रद्दी बताती हुई, सारे मामले को ‘मतदाता’ की नौटंकी करार दे रही है. तीसरी तरफ़ है हमारा सुप्रीम कोर्ट जो इन पन्नों को लोकतंत्र की नहीं, तथाकथित चुनाव आयोग की संपत्ति बता रहा है और कह रहा है कि भले पन्ने चीथड़े हो गए हैं लेकिन हमें व्यवस्था को बचा कर तो रखना है न!
‘हरिश्चंद्र’ नाटक के दुखांत-सी इस नाटिका के पीछे कहीं से एक आवाज़ और भी आती है: “ मैं निश्चित देख रहा हूं कि दलीय लोकतंत्र की इस यात्रा में एक वक्त ऐसा आने ही वाला है जब तंत्र व लोक के बीच वर्चस्व की लड़ाई होगी… और तब यह याद रखना कि लोक के नाम पर बने ये सारे लोकतांत्रिक संवैधानिक संस्थान, लोक के नहीं, तंत्र के साथ जाएंगे, क्योंकि वे वहीं से पोषण पाते हैं.” जरा गौर से सुनेंगे तो आप पाएंगे कि यह आवाज़ महात्मा गांधी की है.