15 अगस्त को लाल किले से मोदी जी ने अपने समर्थकों को एक नया झुनझुना पकड़ा दिया- 'दिमागी नक्सल'. उनकी पार्टी के हुनरबाज़ों ने लगे हाथ दिमागी नक्सल पर रैप सॉन्ग ठेल दिया. लेकिन सवाल ये है कि क्या देश के युवाओं की असली परेशानियां ‘दिमागी नक्सल’ और ऐसे नारों से हल हो जाएंगी?
इस हफ्ते की टिप्पणी में बात होगी बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक और खाली पड़े सरकारी पदों के साथ आरक्षण के खिलाफ उठ रही नई आवाज़ों पर. क्या आरक्षण वाकई बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली की जड़ है, या फिर सदियों से चली आ रही सामाजिक असमानता को कम करने और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का एक जरिया?