
13 मई, 2025 को दोपहर 12.48 बजे, अब्दुल वाहिद शेख अकादमिक सफलता की दहलीज पर खड़े थे. कई सालों के संघर्ष के बाद, ये 47 वर्षीय अध्यापक महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में महात्मा गांधी मिशन यूनिवर्सिटी में "जेल साहित्य" पर अपनी पीएचडी थीसिस जमा कर रहे थे. एक इंसान जिसने बेगुनाह होते हुए भी नौ साल जेल में बिताए थे, अब अपने अस्तित्व को परिभाषित करने वाले विषय पर ही अपना डॉक्टरेट पूरा कर रहा था.
पर तभी उसका फोन बजा.