
21 मई 2025, अब केवल तिथियों की श्रृंखला में नहीं जुड़ता, बल्कि साहित्य के विवेक में एक दीर्घ प्रतिध्वनि की तरह दर्ज हो गया है. द हार्ट लैंप के लिए बानू मुश्ताक़ को मिला अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार एक किताब या एक लेखिका की विजय भर नहीं है. यह भारतीय भाषाओं की उस सामूहिक आकांक्षा का आलोक है जिसे लंबे समय तक परिधि पर रख दिया गया था.
दीपा भास्ती का अनुवाद इस संग्रह की आत्मा को केवल दूसरी भाषा में नहीं रखता, वह उसे एक नई संवेदना, एक नई स्वीकृति देता है. बिना उसका मूल खोए. यह क्षण हमें स्मरण कराता है कि साहित्यिक भाषा की ताक़त केवल उसके शब्दों में नहीं होती, उसकी नमी, उसकी गंध, उसका मौन भी उतना ही निर्णायक होता है.